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Monday, June 13, 2011

सूर्य पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में

                  सूर्य  पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में   
                                    विश्लेष्णात्मक अध्ययन 
वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है |.समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है |सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है| वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है| वेदों की   ऋचाओं में अनेक स्थानों पर  सूर्य देव की स्तुति की गई  है |  पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति ,प्रभाव ,स्तुति मन्त्र इत्यादि का वर्णन है | ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है | प्रस्तुत लेख में सूर्य का पुराणों एवम ज्योतिष साहित्य के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन किया गया है |
सूर्य देव की उत्पत्ति
मार्कंडेय पुराण के अनुसार  पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था | उस समय कमलयोनि ब्रह्मा  जी प्रगट हुए | उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था | तत्पश्चात ब्रह्मा  जी के चार मुखों से चार वेद प्रगट हुए जो  ॐ के तेज में एकाकार हो गये |
यह वैदिक तेज ही  आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है|  ये वेद स्वरूप सूर्य ही श्रृष्टि की उत्पत्ति ,पालन व संहार के  कारण हैं | ब्रह्मा  जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया |
 सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा  जी के पुत्र मरीचि हुए जिनके पुत्र  ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ | अदिति ने घोर तप द्वारा भगवान् सूर्य को प्रसन्न  किया जिन्होंने उसकी इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उसके गर्भ में प्रवेश  किया | गर्भावस्था में भी अदिति चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी | ऋषि राज कश्यप ने क्रोधित हो कर अदिति से कहा - " तुम इस तरह उपवास रख कर गर्भस्थ शिशु को क्यों मरना चाहती हो | " यह सुन कर देवी अदिति ने  गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था |भगवान् सूर्य शिशु रूप में उस गर्भ से प्रगट हुए | अदिति को मारिचम - अन्डम कहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ | ब्रह्म  पुराण  में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को  विवस्वान कहा गया है | 
सूर्य का स्वरूप एवम प्रकृति
मत्स्य पुराण के अनुसार सूर्य  कमलासन पर विराजमान हैं | उनकी कांति कमल के भीतरी भाग जैसी है | वे सात अश्वों के रथ पर आरूढ़   हैं जो सात ही रज्जुओं से बंधे हुए हैं |
ब्रह्म पुराण के अनुसार भी  सूर्य  कमलासन पर विराजमान हैं | उनके नेत्र पीले हैं तथा शरीर का वर्ण लाल है | उनका रूप तेजस्वी है तथा वस्त्र कमल के समान लाल हैं |
ज्योतिष शास्त्र के प्रसिद्ध फलित ग्रंथों के अनुसार सूर्य पित्त प्रधान ,चतुरस्र देह ,अल्पकेशी, पिंगल दृष्टि ,लाल वर्ण ,तीक्ष्ण ,शूर एवम अस्थि प्रधान है |
सूर्य  का  रथ एवम गति 
 देवी भागवत ,मत्स्य ,नारद ,ब्रह्माण्ड एवम गरुड़ आदि पुराणों   के अनुसार  सूर्य के रथ में एक चक्र है जिसकी तीन पूर्वान्ह ,मध्यान्ह व अपरान्ह रुपी नाभियाँ हैं |परिवत्सरादिक पांच अरे हैं | छः वसंत आदि ऋतु रुपी नेमियाँ हैं | अक्षय स्वरूपी संवत्सर  से युक्त उस चक्र में सम्पूर्ण कालचक्र स्थित है | दिन को रथ की नाभि कहा गया है | वर्ष उसके अरे हैं |चारों युग इसके धुरे के छोर हैं |पवन  वेगी अश्वों से जुते इसी रथ पर सूर्य देव आकाश मंडल में भ्रमण करते हैं | राशि चक्र में सिंह राशि पर इनका अधिकार है |
          कुम्हार के चाक के सिरे पर घूमते हुए जीव के समान भ्रमण करता  हुआ सूर्य पृथ्वी  के तीस भागों का एक दिन रात में अतिक्रमण करता है |उत्तरायण के आरम्भ में मकर राशि में प्रवेश  करता हैतो इसकी गति मंद हो जाती है | कर्क राशि में प्रवेश करने पर ये दक्षिणायन हो जाते हैं | जब सूर्य मेष एवम तुला राशि में होते हैं तो उस समय दिन एवम रात्रि का मान समान होता है | वृष आदि पांच राशियों में सूर्य भ्रमण के समय दिनमान में वृद्धि तथा रात्रिमान में कमी एवम वृश्चिक आदि पांच राशियों में  सूर्य भ्रमण के समय दिनमान  में कमी तथा रात्रिमान में वृद्धि होती है |
              उदय से ले कर सूर्य की गति के तीन मुहूर्त के समय को प्रातःकाल कहते हैं | इस से आगे के तीन तीन मुहूर्त का समय क्रमशः संगव  ,मध्यान्ह ,अपरान्ह ,एवम सांयकाल होता है |सूर्य की दो घडी की गति का परिमाण 3150000  योजन से अधिक है | उत्तर दिशा में सूर्य मार्ग को नागवीथि तथा दक्षिण दिशा में  अजवीथि  कहा जाता है | सम्पूर्ण दिन रात्रि में तीस मुहूर्त होते हैं | शरद व वसंत ऋतु  में जब सूर्य तुला व मेष राशि में संचार करता है उसे विषुव काल कहते हैं | इस काल में 15 मुहूर्त दिन में तथा 15 मुहूर्त रात में होने के कारण दिन व रात का मान समान होता है | विषुव काल को  अति पवित्र कहा गया है | इस समय देवता ,ब्राह्मण एवम पितृगण  के निमित्त  किया गया दान अक्षय होता है |  विष्णु पुराण के अनुसार सूर्य ही समस्त  वृष्टियों का मूल कारण है | सूर्य समस्त लोकों के समुद्रों ,सरोवरों ,नदियों व स्थावर -जंगम  प्राणियों में स्थित जल को अपनी किरणों द्वारा खींचते रहते हैं | यह जल मेघों में प्रवर्तित  होता रहता है | मेघ वायु द्वारा प्रेरित हो कर पृथ्वी पर जल की वृष्टि करते हैं जिस से अन्न की उत्पत्ति होती है और अन्न से ही सम्पूर्ण जगत का पोषण होता है |  
सूर्य का कारकत्व  
 पुराणों के अनुसार सभी प्राणियों की आत्मा सूर्य ही है | इन्द्रियों में नेत्रों का स्वामी सूर्य है | नेत्रों में कष्ट होने पर सूर्य स्तोत्र का पाठ करना कहा गया है |
ज्योतिष  शास्त्र में  सूर्य को आत्मा ,नेत्र ,पिता ,प्रताप ,आरोग्यता ,लाल  रंग के पदार्थ  ,अस्थि ,सिर ,हृदय ,उदर,महत्वकांक्षा ,राजनीति ,राजा इत्यादि का कारक कहा गया है | 
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य  
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य आकाश में स्थित क्रान्ति वृत्त के राशि चक्र में एक दिन में लगभग एक अंश की गति से भ्रमण करता है | यह सदैव मार्गी होता है | यह सिंह राशि का स्वामी है जिसमें 1-20 अंश तक मूल त्रिकोण तथा 21-30 अंश तक स्व राशि में समझा जाता है | सूर्य मेष राशि के 1 अंश से 9 अंश तक उच्च तथा 10 अंश पर परम उच्च होता है | तुला राशि में 1-9 अंशों तक नीच तथा 10 अंश पर परम नीच का होता है | सूर्य अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है | चन्द्र ,मंगल गुरु  सूर्य के मित्र ,बुध सम , शनि व शुक्र शत्रु हैं | सूर्य द्वारा एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है | वर्ष में बारह संक्रांतियां होती हैं | सूर्य संक्रांति से 16 घटी पहले तथा 16 घटी बाद में पुण्य काल  होता है जो दान ,जाप ,उपासना, होम इत्यादि धार्मिक कार्यों के लिए उत्तम कहा गया है |     
              सूर्य का निसर्ग बल नव ग्रहों  में सबसे अधिक है | उत्तरायण में ,अपने वार- होरा -नवांश में ,स्व -मित्र-मूल त्रिकोण  -उच्च राशि में , वर्गोत्तम नवांश में, दिन के मध्य में तथा लग्न से दशम स्थान पर  सूर्य सदा बली एवम शुभ फलदायक होता है |  सूर्य से पहले स्थित ग्रह अधोमुखी हो कर अशुभ तथा बाद में उर्ध्वमुखी हो कर शुभ फल देने वाले होते हैं |     
 सूर्य और रोग 
जन्म कुंडली में सूर्य यदि नीच -शत्रु राशिस्थ ,पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो कर त्रिक में हो तो नेत्र कष्ट ,हृदय रोग ,सिर में  पीड़ा या रोग ,पित्त जनित विकार ,अस्थि रोग ,ज्वर इत्यादि रोग प्रदान करता है |  
सूर्य का राशि फल  
जन्म कुंडली में मेष आदि राशियों में सूर्य का सामान्य  फल इस प्रकार है --------
मेष  सूर्य की उच्च राशि है | इसमें स्थित होने पर जातक धनी,साहसी ,उग्र ,ऊँचे चरित्र का अपने कार्यों से प्रतिष्ठा पाने वाला , मजबूत  अस्थियों   वाला तथा  कला  में रूचि रखने वाला होता है |
वृष  राशि में स्थित होने पर जातक सुगंध प्रेमी ,गीत -संगीत को जानने वाला ,मुख -नेत्र रोग से पीड़ित ,व्यापारी एवम स्त्रियों से शत्रुता रखने वाला होगा |
मिथुन  राशि में स्थित होने पर जातक ज्योतिष  शास्त्र का ज्ञाता ,धनवान ,मेधावी ,विज्ञान में निपुण ,विनीत , उदार तथा बंधु प्रिय  होता है |
कर्क  राशि में स्थित होने पर जातक  मीठी वाणी का ,चतुराई से बोलने वाला ,सुरूप , दूसरों के कार्य करने वाला तथा यात्रा में क्लेश उठाने वाला होता है |
 सिंह राशि में स्थित होने पर जातक  शत्रु हन्ता ,वन पर्वत में भ्रमण में रूचि रखने वाला ,तेजस्वी ,धनी ,विख्यात ,स्थिर विचारों का ,गंभीर तथा क्रोधी होता है |

  कन्या राशि में स्थित होने पर जातक  दुबला ,अल्प बली, सरल ,लज्जा युक्त ,मेधावी ,तथा कोमल स्वभाव का होता है |

तुला राशि में स्थित होने पर जातक  पराजित ,द्वेषी ,निर्धन ,परकार्य रत ,मलिन ,ढीठ ,निम्न कार्य करने वाला ,मद्य विक्रेता ,रोगी ,व्यसनों  से पीड़ित होता है |
वृश्चिक राशि में स्थित होने पर जातक  शत्रुजित,राजा की कृपा से सुख प्राप्त करने वाला ,वैदिक धर्म का आचरण करने वाला ,स्त्री को प्रिय ,धनी ,कठोर स्वभाव का तथा शस्त्र चलाने में निपुण  होगा |   
धनु राशि में स्थित होने पर जातक  राजा का कृपा पात्र  ,पंडित ,व्यवहार कुशल ,चतुर ,आयुर्वेद या शिल्प विद्या का ज्ञाता ,धनवान तथा बंधु हितकारी होगा |
मकर राशि में स्थित होने पर जातक  विपत्तियों से घिरा हुआ ,अशुभ कार्य करने वाला ,,सज्जनों का शत्रु ,लोभी ,चच्चल ,अधिक भोजन करने वाला तथा बंधु हीन होगा |
 कुम्भ राशि में स्थित होने पर जातक स्थिर द्रोही ,कोपी ,विरोध करने को तत्पर ,व्ययी ,अनिश्चित ,पापी ,कृतघ्न ,दूषित कार्य करने वाला ,भाग्य हीन ,हृदय रोगी ,अविश्वसनीय मित्र ,चुगली करने वाला तथा दुखीहोगा |मीन राशि में स्थित होने पर जातक पुण्यवान ,गुरु व मित्र में प्रीति करने वाला ,प्रसन्न चित्त ,धार्मिक ,स्त्री से पूजित ,जलोत्पन्न पदार्थों का व्यापार करने वाला होगा |
दशा फल एवम समय  
सूर्य जन्म कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार अपना  शुभाशुभ फल अपनी दशाओं में प्रदान करता है | सर्व प्रचलित विंशोत्तरी दशा के अनुसार सूर्य की महादशा 6 वर्ष की होती है |दूसरे ग्रहों की महादशाओं में अपनी अन्तर्दशा आने पर भी सूर्य का शुभाशुभ फल मिलता है | जन्म कुंडली में सूर्य शुभ फल दायक सिध्ध होता हो तो उसकी  दशा  में यश वृध्धि ,स्वर्ण लाभ ,पिता एवम राजा से लाभ ,उद्योगशीलता ,राज सम्मान ,प्राकृतिक स्थलों पर भ्रमण होगा |यदि  अशुभ  फल देने वाला हो तो ज्वर ,सिर पीड़ा ,नेत्र कष्ट ,पित्त की अधिकता , क्रोध ,पिता को कष्ट ,राजा से हानि ,धन व यश की हानि ,हृदय रोग ,एवम कलह क्लेश होगा | 22-24 वर्ष की अवधि में भी सूर्य का शुभाशुभ फल मिलता है |
गोचर  में  सूर्य 
जन्मकालीन चन्द्र से 3,6,10,11 वें स्थान पर गोचर वश जाने पर सूर्य शुभ फल प्रदान करता है | क्रमानुसार 9,12,4,5 वां इनका  वेध स्थान है जहां किसी ग्रह के स्थित होने पर सूर्य का शुभ फल नहीं मिलता | सूर्याष्टक वर्ग में जिन राशियों में चार से अधिक शुभ बिंदु प्राप्त हैं उनमें गोचर वश जाने पर सूर्य का शुभ फल प्राप्त होगा | यह गोचर प्रभाव जानने  की  अधिक सूक्ष्म विधि है |
रत्न एवम धातु 
सूर्य की धातु ताम्बा है | माणिक्य सूर्य का रत्न  तथा  लालडी उपरत्न है |  सूर्य यदि  अशुभ  फल देने वाला हो तो ताम्बे या सोने में माणिक्य या लालडी  सूर्य के नक्षत्रों --कृतिका,उत्तरा फाल्गुनी व उत्तराषाढ़ में जडवा कर    रविवार को धारण करना चाहिए |    
 दान ,जाप व व्रत 
रविवार को सूर्योदय के बाद गेंहु,गुड ,केसर ,लाल चन्दन ,लाल वस्त्र ,ताम्बा, सोना  तथा लाल रंग के फल दान करने चाहियें | सूर्य के बीज मन्त्र ॐ  ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः  के 7000 की संख्या में जाप करने  से भी सूर्य कृत अरिष्टों की निवृति हो जाती है | गायत्री जाप से , रविवार के मीठे व्रत रखने से तथा ताम्बे के पात्र में जल में  लाल चन्दन ,लाल पुष्प ड़ाल कर नित्य सूर्य को अर्घ्य  देने पर भी शुभ  फल प्राप्त होता है |  विधि पूर्वक बेल पत्र की जड़ को रविवार में लाल डोरे में धारण करने से भी सूर्य प्रसन्न हो कर शुभ फल दायक हो जाते हैं  |           

Thursday, July 2, 2009

विवाह में अष्टकूट एवम गुण मिलान

विवाह में अष्टकूट एवम गुण मिलान
भारत वर्ष में विवाह से पूर्व वर एवम कन्या के जन्म नक्षत्रों के अनुसार अष्टकूट मिलान से गुण मिलाने की प्राचीन परम्परा है|
वर , कन्या तथा उनके परिजन एक -दूसरे की प्रकृति ,गुण -दोष आदि के बारे में प्रायःअनभिज्ञ होते हैं | विवाह से पूर्व दोनों पक्ष अपने दोषों को छिपाते हैं तथा गुणों को बढा -चढा कर दिखाते हैं जिसके कारण विवाह के कुछ समय बाद ही पति -पत्नी के संबंधों में तनाव आरम्भ हो जाता है |विवाहोपरांत वर एवम कन्या की परस्पर अनुकूलता हो ,दोनों की आयु दीर्घ हो ,धन -संपत्ति एवम संतान का सुख उत्तम हो इसी उद्देश्य से ऋषि -मुनिओं ने अपने ज्ञान एवम अनुसन्धान के आधार पर वर एवम कन्या की जन्म राशिः तथा जन्म नक्षत्रों के अनुसार विवाह से पूर्व अष्टकूट मिलान से गुण मिलाने की श्रेष्ठ पद्दति का विकास किया |प्रश्न -मार्ग ,विवाह वृन्दावन ,मुहूर्त गणपति ,मुहूर्त चिंतामणि प्रभृति ग्रंथों में अष्टकूट मिलान एवम इसकी उपयोगिता पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है |
क्या है अष्टकूट ?
वर्णों वश्यं तथा तारा योनीश्च गृह मैत्रकम |
गण मैत्रं भकूटश्च नाडी चैते गुणाधिका ||
[ मुहूर्त चिंतामणि ]
1. वर्ण 2. वश्य 3, तारा 4. योनि 5. ग्रह मैत्री 6. गण 7. भकूट 8.नाडी ये आठ अष्टकूट हैं जिनका विचार मिलान में किया जाता है | क्रम संख्या के अनुसार ही इनके गुण होते हैं |जैसे वर्ण का क्रम एक है तो गुण भी एक होगा ,योनि का क्रम चार है तो गुण भी चार ही होंगे |इस प्रकार क्रमानुसार योग करने पर अष्टकूटोँ के कुल गुण 1+2+3+4+5+6+7+8=36 गुण होते हैं |
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1. वर्ण कूट


वर्णजन्म योनि

ब्राह्मणकर्क ,वृश्चिक ,मीन
क्षत्रियमेष ,सिंह ,धनु
वैश्यवृष,कन्या मकर
शूद्रमिथुन ,तुला कुम्भ



वर का वर्ण कन्या से उत्तम होने पर एक गुण अन्यथा शून्य गुण मिलता है |


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2. वश्य कूट

संज्ञाराशिः
नरमिथुन ,कन्या ,तुला एवम धनु 15 अंश तक
चतुष्पदमेष ,वृष ,सिंह ,धनु के अंतिम 15 अंश ,मकर 15 अंश तक
जलचर कुम्भ ,मीन ,मकर के अंतिम 15 अंश
कीटकर्क ,वृश्चिक


सिंह राशिः को छोड़ कर सभी राशियां नर के वश में होती हैं| वृश्चिक को छोड़ कर शेष राशियां सिंह राशिः के वश में हैं |समान वश्य में 2 गुण ,एक वश्य व दूसरा शत्रु हो तो 1 गुण ,एक वश्य व दूसरा भक्ष्य हो तो 1/2 गुण प्राप्त होते हैं |
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3. तारा कूट
कन्या के जन्म नक्षत्र से वर के जन्म नक्षत्र तक तथा वर के जन्म नक्षत्र से कन्या के जन्म नक्षत्र तक गिनें |दोनों संख्याओं को अलग -अलग 9 से भाग दें |शेष 3,5,7 हो तो तारा अशुभ अन्यथा शुभ होगी |दोनों तारा अशुभ हो तो 0 गुण , दोनों शुभ हों तो 2 गुण ,एक अशुभ व दूसरी शुभ हों तो 1 गुण होता है |

4.योनि कूट



वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
वैर

योनी


नक्षत्र
नक्षत्र


अश्व
महिष
सिंह
हाथी
मेढा
वानर
नेवला
सर्प
मृग
श्वान
बिल्ली
मूषक
व्याघ्र
गौ
अश्वनी
शतभिषा
स्वाति
हस्त
धनिष्ठा
पू0भा0
भरणी
रेवती
पूष्य
कृतिका
श्रवण पू०षा उ0षा
अभिजित
मृगशिरा रोहिणी

ज्येष्ठा
अनुराधा
मूल
आर्द्रा
पुनर्वसु अश्लेशा
मघा
पू०फ़ा0
विशाखा चित्रा

उ०भा
उ०फ़ा0



एक ही योनि हो या अधि मित्र योनि हो तो 4 गुण , मित्र हो तो 3 गुण ,सम हो तो 2 गुण ,वैर में 1 गुण तथा महा वैर में 0 गुण मिलता है |
5. ग्रह मैत्री कूट


ग्रह--->
सूर्य
चन्द्र
मंगल
बुध
गुरु
शुक्र
शनि
मित्र
चन्द्र मंगलगुरु सूर्य बुध चन्द्र सूर्य गुरु सूर्य शुक्र चन्द्र सूर्य मंगल बुध शनि बुध शुक्र
सम
बुध मंगल गुरु शुक्र शनि शुक्र शनि मंगल गुरु शनि शनि मंगल गुरु गुरु
शत्रु
शुक्र शनि
बुध चन्द्र बुध शुक्र चन्द्र सूर्य चन्द्र सूर्य मंगल


वर -कन्या की एक ही राशिः हो या परस्पर मैत्री हो तो 5 गुण ,एक मित्र व एक सम हो तो 4 गुण ,दोनों सम हों तो 3 गुण ,एक मित्र व एक शत्रु हो तो 1 गुण ,एक सम व एक शत्रु हो तो 1/2 गुण ,दोनों शत्रु हों तो 0 गुण मिलता है |


6.गण

देव गण
मानव गण
राक्षस गण
अश्वनी
भरणी
कृतिका
मृगशिरा
रोहिणी
आश्लेषा
पुनर्वसु
आर्द्रा
मघा
पुष्य
पूर्वा ० फा 0
चित्रा
हस्त
उत्तरा ० फा 0
विशाखा
स्वाति
पूर्वाषाढ़
ज्येष्ठा
अनुराधा

उत्तरा षाढ़
मूल
श्रवण
पूर्वा ० भा 0
धनिष्ठा
रेवती
उत्तरा ० भा o
शतभिषा


वर ,कन्या का गण समान हो तो 6 गुण, वर का देव तथा कन्या का मानव गण हो तो 6 गुण , कन्या का देव तथा वर का मानव गण हो तो 5 गुण ,कन्या का देव तथा वर का राक्षस गण हो तो 1 गुण ,कन्या का राक्षस तथा वर का देव गण हो या एक का मानव व दूसरे का राक्षस गण हो तो 0 गुण मिलता है |

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7 भकूट

वर एवम कन्या की जन्म राशि एक -दूसरे से 6-8, 5-9, 2-12 वें हो तो भकूट दोष होता है |
6-8 अर्थात षडाष्टक दोष से रोग ,कलह या वियोग , 5-9 अर्थात नव-पंचम से अन्पत्यता , 2-12 अर्थात द्वि -द्वादश दोष से हानि एवम दरिद्रता होती है |भकूट दोष होने पर 0 गुण अन्यथा 7 गुण मिलते हैं |

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8. नाडी कूट
आदि नाडी
अश्वनी

आर्द्रा

पुनर्वसु

उ0फा0
हस्त

ज्येष्ठा
मूल
शतभिषा
पू०भा0
मध्य नाडी
भरणी
मृगशिरा
पुष्य
पू०फ़ा0
चित्रा
अनुराधा
पू0षा0
धनिष्ठा उ०भा0
अन्त्य नाडी
कृतिका
रोहिणी
आश्लेषा
मघा
स्वाति
विशाखा
उ० षा०
श्रवणरेवती
वर कन्या का जन्म नक्षत्र एक ही नाडी में हो तो अत्यन्त अशुभ समझा जाता है तथा शुन्य गुण मिलता है । अन्यथा आठ गुण प्राप्त होते है ।
दोनों का जन्म नक्षत्र आदि नाडी मे हो तो वियोग , मध्य में हो तो हानि , तथा अन्त्य नाडी मे हो तो मृत्यु अथवा दारुण कष्ट सहना पड़ता है ।
अष्टकूट दोषों का परिहार
यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि वर एवम कन्या के जन्म नक्षत्र का मिलान करते हुए सभी ज्योतिषी अष्टकूट दोषों का विचार तो करते हैं पर उनके परिहारों को महत्त्व प्रदान नहीं करते |सभी मेलापक एवम मुहूर्त ग्रंथों में अष्टकूट दोषों के साथ ही उनके परिहारों का वर्णन किया गया है | परिहार उपलब्ध होने पर दोष कि निवृति मान कर उसके आधे गुण ग्रहण करने का शास्त्र उपदेश देते हैं |कुल 36 गुणों में से 18 से 21 तक गुण मिलने पर मिलान मध्यम तथा इस से अधिक होने पर उत्तरोतर शुभ मिलान होता है |18 से कम गुण मिलने पर विवाह सम्बन्ध नहीं करना चाहिए |अष्टकूट दोषों का परिहार निम्नलिखित प्रकार से वर्णित है :
अष्टकूट
परिहार
वर्ण
राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
वश्य
राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
तारा
राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
योनि
राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
राशिः मैत्री
1 राशियों के नवांशेशों कि मैत्रीया एकता हो |
2 भकूट दोष न हो |
|गण
1 राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो | 2 भकूट दोष न हो |

भकूट
राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
नाडी
1. दोनों कि राशिः एक तथानक्षत्रअलग-अलग हों |
2. दोनों के नक्षत्र एक तथा राशि अलग -अलग हो |
3. दोनों के नक्षत्रों में चरण वेध न हो अर्थात
दोनों के नक्षत्रों के चरण 1-4 या 2-3 न हो क्योंकि इनमें परस्पर वेध होता है |

Friday, June 12, 2009

मांगलिक दोष में भ्रान्तियों का निवारण

मांगलिक दोष में भ्रान्तियों का निवारण
विवाह के समय वर एवम कन्या की जन्म कुंडली मिलान करते हुए अष्टकूट के साथ -साथ मांगलिक दोष पर भी विचार किया जाता है |परन्तु खेद है कि अधिकांश दैवज्ञ इस महत्व पूर्ण विषय पर विचार करते हुए कुछ मुहूर्त ग्रंथों के अप्रमाणिक एवम तर्क हीन वाक्यों का आधार ले कर त्रुटि पूर्ण मिलान करते हैं तथा फलित शास्त्र के महत्व पूर्ण सूत्रों कि उपेक्षा करते हैं|ऐसा करते हुऐ ये दैवज्ञ शास्त्र एवम समाज दोनों को हानि पहुंचाते हैं |इस प्रकार के त्रुटि पूर्ण विवाह सफल नहीं हो पाते |
क्या है मांगलिक दोष ?
जन्म कुंडली






जन्म कुंडली में 1,4,7,8,12 वें भावः में यदि मंगल स्थित हो तो वर अथवा कन्या को मंगली कहा जाता है
तथा उसका विवाह मंगली वर /कन्या से करना शुभ समझा जाता है |मंगल ग्रह को ज्योतिष ग्रंथों में रक्त प्रिय एवम हिंसा व विवाद का कारक कहा गया है |सातवाँ भाव जीवन साथी एवम गृहस्थ सुख का है |इन भावों में स्थित मंगल अपनी दृष्टि या स्थिति से सप्तम भाव अर्थात गृहस्थ सुख को हानि पहुँचाता है |दैवज्ञॉ की एक
बड़ी संख्या जन्म कुंडली में उपरोक्त स्थानों पर मंगल को देख कर वर या कन्या को तत्काल मंगली घोषित
कर देती है फ़िर चाहे मंगल नीच राशिः में हो या उच्च में ,मित्र राशिः में हो या शत्रु में | मंगल दोष के परिहार को या तो अनदेखा किया जाता है या शास्त्रीय नियमों की अवहेलना करने वाले परिहार वाक्यों को लागू करके
त्रुटि युक्त मिलान कर दिया जाता है |
क्या कहते हैं ज्योतिष के शास्त्रीय मूलभूत नियम ?
फलित ज्योतिष के सर्वमान्य ग्रंथों के अनुसार जो ग्रह अपनी उच्च ,मूल त्रिकोण ,स्व ,मित्र राशिः --नवांश में स्थित ,वर्गोत्तम ,षड्बली ,शुभ ग्रहों से युक्त -दृष्ट हो वह सदैव शुभकारक होता है |इसी प्रकार नीचस्थ ,अस्त ,शत्रु राशिस्थ ,पापयुक्त ,पाप दृष्ट ,षड्बल विहीन ग्रह अशुभ कारक होता है |

नीचस्थो रिपु राशिस्थ खेटो भावविनाशकः|
मूल स्व तुंग मित्रस्थो भाव वृद्धि करो भवेत् ||
[ जातक - पारिजात ]


नीचारिगो भाव विनाश कृत्खगःसमः समर्क्षे सखि भे त्रिकोण भे |
स्वोच्चे स्व भे भावचय प्रदः फल दुःस्थेस्व सत्सत्सु विलोम ||
[ज्योतिस्तत्व ]
पाप ग्रहभी यदि स्व , उच्च , मित्र राशि --नवांश ,वर्गोत्तम ,शुभ युक्त , शुभ दृष्ट हों तो शुभ कारक होते हैं ,
देखिये :
स्वीय तुंग सखि सदभ संस्थित पामरोअपि यदि सत्फलम व्रजेत |
[ भाव मंजरी ]
पाप ग्रहा बलयुताः शुभ वर्ग संस्था सौम्या भवन्ति शुभ वर्गग सोम्य दृष्टाः|
[जातका देश मार्ग ]

उपरोक्त सन्दर्भों से यह स्पष्ट है कि जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व ,उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का ,वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा जब कि अधिकाँश दैवज्ञ उस वर /कन्या को मांगलिक घोषित करके कितना अनर्थ करते हैं | करते हैं | प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों एवम फलित सूत्रों क्र अनुसार जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा :-
1.. यदि मंगल इन भावों में स्व ,उच्च ,मित्र राशिः --नवांश का हो |
2. यदि मंगल इन भावों में वर्गोत्तम नवांश का हो |
3..यदि इन भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो |
| एक और गंभीर गल्ती जो प्रायः आजकल अल्प ज्ञानी ज्योतिषियों द्वारा की जा रही है वह है ,मांगलिक दोष का विचार भाव कुंडली से न करना |चलित कुंडली में संधि स्थान पर स्थित मंगल का भाव फल शून्य होगा | कभी -कभी भाव मध्य स्पष्ट एवम मंगल स्पष्ट का अंतर 15 अंश से अधिक होने पर मंगल अगले या पिछले भाव का फल करने के कारण दोष कारक नहीं रहता
सप्तम भाव का स्वामी बलवान हो तथा अपने भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है |
क्या 28 वें वर्ष के बाद मांगलिक दोष नहीं रहता ?
यह दोष पूर्ण अवधारणा बहुत प्रचलित है |मंगल 28 वें वर्ष में अपना शुभाशुभ फल प्रदान करता है यह सत्य है किन्तु अपनी दशा ;अन्तर्दशा ,प्रत्यंतर दशा या गोचर में कभी भी अपना अशुभ फल प्रगट कर सकता है |अतः 28 वें वर्ष के बाद मांगलिक दोष की निवृति नहीं होती |
क्या शनि या राहु से युक्त मंगल होने पर मांगलिक दोष नहीं रहता ?
कुछ मुहूर्त ग्रंथों मैं ऐसे वाक्य मिलते हैं कि शनि या राहु से युक्त मंगल होने पर मांगलिक दोष नहीं रहता किन्तु ये वाक्य फलित ज्योतिष के शास्त्रीय नियमों के विरूद्व हैं | यह सर्वमान्य फलित ज्योतिष सिद्धांत है कि पाप ग्रह कि युति किसी ग्रह के पाप फल मैं वृद्धि करती है उसका दोष दूर नहीं करती | देखिये : नीचादी दुः स्थगे भूमि सुते बल विवर्जिते |
पाप युक्ते पाप दृष्टे सा दशा नेष्ट दायिका ||
[ बृहत् पाराशर ]

नीच शत्रु गृहम प्राप्ताः शत्रु निम्नांश सूर्य गाः |
वि वर्णाः पाप संबंधा दशां कुर्मुर शोभनाम ||
[सारावली]
बृहत् पाराशर के अनुसारविकलः पाप संयुतः अर्थात पापी ग्रह से युक्त ग्रह विकल अवस्था का होगा तथा दोष कारक होगा अतः स्पष्ट है की शनि या राहु की युति से मांगलिक दोष की निवृति नहीं अपितु वृद्धि होगी क्योंकि ये दोनों ग्रह पापी हैं और मंगल के अशुभ फल में वृद्धि करेंगे |

उपरोक्त तथ्यों से यही निष्कर्ष निकलता है कि मांगलिक दोष का निर्णय वर तथा कन्या कि जन्म कुंडलियों का सावधानी पूर्वक अनुशीलन करके करना चाहिए तथा जल्दबाजी से किसी परिणाम पर नहीं पहुंचना चाहिए | ऐसा करके ही हम समाज व शास्त्र का हित कर सकते हैं |

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Wednesday, October 29, 2008

जन्म कुंडली से वैवाहिक सुख का ज्ञान

विवाह समाज द्वारा स्थापित एक प्राचीनतम परम्परा है जिसका उद्देश्य काम -संबंधों को मर्यादित करके सृष्टि की रचना में सहयोग देना है |सभी पुराणों,शास्त्रों एवम धर्म ग्रंथों में पितरों के ऋण से मुक्त होने के लिए तथा वंश परम्परा की वृद्धि के लिए विवाह की अनिवार्यता पर बल दिया गया है |
जन्म कुंडली से विवाह सुख का विचार
विवाह कब होगा ? विवाह होगा या नहीं ? जीवन -साथी कैसा होगा ? गृहस्थ जीवन कैसा रहेगा ? प्रेम विवाह होगा या पारम्परिक रीति रिवाजों के अनुसार - इत्यादि प्रश्नों का उत्तर हम अपनी जन्म कुंडली से प्राप्त कर सकते हैं |सभी प्राचीन फलित ज्योतिष के ग्रन्थ इस तथ्य पर सहमत हैं की जन्म कुंडली के सप्तम भाव से विवाह एवम गृहस्थ सुख का विचार करना चाहिए |लग्न एवम चन्द्र में जो बलवान हो उससे सप्तम भाव ग्रहण करना चाहिए |
पति /पत्नी के गुण ,स्वभाव व रूप का ज्ञान
सप्तम भाव में जैसा ग्रह स्थित होगा उसके कारक्तव व गुण -स्वभाव के अनुसार ही पति/पत्नी का गुण -रूप व स्वभाव होगा |सप्तम भाव में एक से अधिक ग्रह हों तो उनमे बली ग्रह का प्रभाव होगा | सप्तम भाव ग्रह रहित हो तो सप्तमेश या शुक्र के नवांश पति के अनुसार पति /पत्नी का स्वभाव आदि कहना चाहिए |
योग कारक ग्रह से पति /पत्नीगुण स्वभाव का ज्ञान
सूर्य--- पित्त प्रकृति ,अल्प केश ,नेत्रों में लालिमाचतुरस्र आकृति ,गंभीर ,उर्ध्व दृष्टि ,
उच्चाभिलाषी ,तेजस्वी ,साहसी ,स्पष्ट वक्ता,अंध विश्वास से रहित ,वाणी तथा चाल में गर्वीलापन ,लाल रंग प्रिय, स्वतंत्रता प्रिय तथा अधिक चर्बी से रहित पुष्ट शरीर
चन्द्र ---- वात एवम कफ प्रकृति ,सुंदर नेत्र ,कोमल शरीर ,मृदु स्वभाव ,चेहरे भरा हुआ व गोलाई लिए ,नाक छोटी ,संवेदनशील ,चंचल ,गीत -संगीत -कविता में रूचि ,सोंदर्य प्रियता ,शरीर में कुछ स्थूलता ,भावुकता ,कल्पना शीलता ,स्वपन दर्शिता ,कभी -कभी निराशा का प्रभाव ,नमकीन पदार्थों में रूचि ,श्वेत रंग प्रिय
मंगल ---पित प्रकृति , नेत्रों में लालिमा, क्रोध एवम आतुरता ,गर्व से युक्त वाणी ,ठोडी बड़ी एवम चौरस ,होंठ कुछ मोटे ,हठी स्वभाव ,वाणी में मिठास का अभाव ,लाल रंग अच्छा लगे ,उन्नत मांसपे शिया ,स्थूलता रहित ,चेहरा लंबा एवम तर्कशील
बुध ----सम प्रकृति ,मुख चौडा ,शरीर भारी ,ठोडी ऊपर को उठी हुई ,उन्नत ललाट ,व्यवहारिक, संचय की प्रवृत्ति ,बहुभोजी ,सतर्क ,हरे पदार्थ प्रिय ,गणित एवम वाणिज्य में रूचि,सांवला रंग ,शरीर में नसें दिखाई दें ,हास्य प्रिय ,तिरछी नजर से देखे ,ग्रामचारी ,
गुरु ---कफ प्रकृति ,केश व नेत्रों का रंग भूरा ,लंबा कद मिष्ठान प्रिय , शरीर भारी , गाल पुष्ट उठी हुई नाक धर्मं मैं रुचि ,वाणी में गंभीरता ,उदार , स्वाभिमानी , अनुशासन प्रिय , उन्नत मस्तक ,पढ़ने लिखने मैं रुचि, श्रेष्ठ मति ,पीला रंग अच्छा लगे ,स्वर्ण के समान गौर वर्ण ,चर्बी की अधिकता
शुक्र ---- वात एवम कफ प्रकृति ,श्याम वर्ण ,रंग -बिरंगे वस्त्र धारण करने में रूचि ,केश काले एवम लहरदार ,खट्टे पदार्थों में रूचि ,सुंदर ,सुखाभिलाशी ,मधुर भाषण ,लंबे हाथ ,सुगंध प्रिय
शनि ---- वात प्रकृति ,काला रंग ,लंबा कद ,अधो दृष्टि ,शुष्क त्वचा एवम केश ,अल्प भाषी ,धीमी चाल ,मोटे दांत ,दुबला शरीर ,शरीर में नसें दिखाई दें ,असुंदर ,वाणी में कठोरता ,नेत्रों में पीलापन ,कंजूस
बहुत से विद्वान् जन्म लग्न के नवांशेश से भी पति /पत्नी की प्रकृति की कल्पना करते हैं |
विवाह स्थान का निर्णय
सप्तम भाव में चर राशिः ,नवांश हो तो विवाह सम्बन्ध जनम स्थान से दूर ,स्थिर राशिः ,नवांश हो तो निकट तथा द्वि स्वभाव राशिः-नवांश हो तो मध्यम दूरी पर तय होता है |सप्तम भाव में जो ग्रह स्थित होते हैं उनमे बली ग्रह की दिशा में विवाह होता है |सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो तो जो बली ग्रह भाव को देखता है उसकी दिशा में विवाह होता है |कोई ग्रह भी न देख रहा हो तो सप्तम भाव में स्थित राशिः या नवांश राशिः की दिशा में विवाह सम्भव होता है |सप्तमेश की अधिष्ठित राशिः -नवांश की दिशा भी विचारणीय होती है |
सूर्य की दिशा पूर्व ,चन्द्र की वायव्य ,मंगल की दक्षिण ,बुध की उत्तर ,गुरु की ईशान ,शुक्र की आग्नेय ,शनि की पश्चिम तथा राहू की नैऋतव दिशा होती है |मेष ,सिंह ,धनु राशिओं की पूर्व दिशा ,वृष -कन्या - मकर की दक्षिण दिशा ,मिथुन - तुला - कुम्भ की पश्चिम दिशा तथा कर्क -वृश्चिक -मीन की उत्तर दिशा होती है |
गृहस्थ जीवन कैसा होगा ?
सप्तमेश ,सप्तम भाव ,कारक शुक्र तीनों शुभ युक्त ,शुभ दृष्ट ,शुभ राशिः से युक्त हो कर बलवान हों ,सप्तमेश व शुक्र लग्न से केन्द्र -त्रिकोण या लाभ में स्थित हों तो गृहस्थ जीवन पूर्ण रूप से सुखमय होता है |लग्न का नवांशेश जन्म कुंडली में बलवान व शुभ स्थान पर हो तो गृहस्थ जीवन आनंद से व्यतीत होता है | लग्नेश एवम सप्तमेश की मैत्री हो व दोनों एक दूसरे से शुभ स्थान पर हों तो दांपत्य जीवन में कोई बाधा नहीं आती |लग्नेश एवम सप्तमेश का जन्म कुंडली के शुभ भावों में युति या दृष्टि सम्बन्ध हो अथवा दोनों एक - दूसरे के नवांश में हों तो पति -पत्नी का परस्पर प्रगाढ़ प्रेम होता है |
सप्तम भाव में पाप ग्रह हों ,सप्तमेश एवम शुक्र नीच व शत्रु राशिः-नवांश में ,निर्बल ,पाप युक्त व दृष्ट ,६,८,१२वें भाव में स्थित हों तो विवाह में विलंब ,बाधा एवम गृहस्थ जीवन में कष्ट रहता है |लग्नेश एवम सप्तमेश एक दूसरे से ६,८,१२ वें स्थान पर हों तथा परस्पर शत्रु हों तो गृहस्थ जीवन सुखी नहीं रहता | ६,८,१२, वें भावों के स्वामी निर्बल हो कर सप्तम भाव में स्थित हों तो वैवाहिक सुख में बाधा करतें हैं |सप्तम भाव से पहले एवम आगे के भाव में पाप ग्रह स्थित हों तो गृहस्थ जीवन में परेशानियाँ रहती हैं |
विवाह कब होगा ?
सप्तम भाव में स्थित बलि ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में विवाह होता है|लग्न अथवा चन्द्र से सप्तमेश ,द्वितीयेश ,इनके नवांशेश ,शुक्र व चन्द्र की दशाएं भी विवाह्कारक होती हैं |सप्तम भाव या सप्तमेश को देखने वाला शुभ ग्रह भी अपनी दशा में विवाह करा सकता है |उपरोक्त दशाओं में सप्तमेश ,लग्नेश ,गुरु एवम विवाह कारक शुक्र का गोचर जब लग्न ,सप्तम भाव या इनसे त्रिकोण में होता है उस समय विवाह का योग बनता है |लग्नेश एवम सप्तमेश के स्पस्ट राशिः -अंशों इत्यादि का योग करें ,प्राप्त राशिः में या इससे त्रिकोण में गुरु का गोचर होने पर विवाह होता है |

Monday, September 29, 2008

वास्तु निर्माण से सम्बंधित शास्त्रीय नियम

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वास्तु
निर्माण से सम्बंधित शास्त्रीय नियम

प्राचीन एवम सर्वमान्य संहिता व वास्तु ग्रंथो में प्रतिपादित कुछ शास्त्रीय वास्तु नियमों का उल्लेख किया जाता है | वास्तु निर्माण में इनका प्रयोग करने पर वास्तु व्यक्ति के लिए सब प्रकार से शुभ ,समृद्धि कारक एवम मंगलदायक होता है |आजकल के तथाकथित वास्तु शास्त्रियों द्वारा जनसाधारण को व्यर्थ के बहम में डालने वाले तथा अपने ही गढे हुए नियमों पचडे में न पड़ कर केवल इन्हीं शास्त्रीय नियमों का पालन करने पर वास्तु सब प्रकार से शुभ होता है।
भूमि
  • पूर्व ,उत्तर ,ईशान दिशाओं में झुकी भूमि शुभ होती है |
  • नदी के समीप ,बाम्बी वाली ,फटी , मन्दिर या चौराहे के निकट की भूमि आवास के लिए शुभ नहीं होती |
  • निर्माणाधीन भूखंड में से कोयला,अस्थि ,केश ,भस्म, भूसा ,कपास एवम चमड़ा आदि शल्य निकाल देने चाहियेंअन्यथा गृह वासिओं को कष्ट प्रदान करते हैं |
  • गृह निर्माण में वास्तु शास्त्र में वर्णित किसी एक ही वृक्ष की लकड़ी का प्रयोग हो तो शल्य दोष नहीं होता |
  • गृह निर्माण में शीशम ,खैर ,देवदार ,सागवान ,चंदन आदि वृक्षों की लकड़ी का प्रयोग करें ।
  • नवीन गृह में पुराने घर की लकड़ी का प्रयोग अशुभ फल दायक है |
वास्तु का आकार
  • वर्गाकार तथा आयताकार भूखंड जिनके चारों कोण ९०-९० अंश के हों वास्तु के लिए शुभ होते हैं |
  • जितने भूखंड पर निर्माण किया जाना है ,उसकी लम्बाई ,चौडाई से दुगनी या अधिक नहीं होनी चाहिए |
  • भूखंड असमान भुजाओं या कोण का हो तो आस-पास जगह छोड़ कर गृह निर्माण वर्ग या आयत में ही करें | खालीजगह पर उद्यान -वनस्पति लगायें |
  • निर्माणाधीन भूखंड को दिक् शुद्ध अवश्य कर लें ,तभी वास्तु पुरूष के पूर्ण अंग वास्तु में आयेंगे तथा गृहस्वामी कोसुख,धन धान्य यश एवम समृद्धि प्राप्त होगी |

किस स्थान पर क्या बनायें
  • गृह के पूर्वी भाग में या उत्तरी भाग में जल का स्थान रखें |
  • आग्नेय कोण में रसोई घर बनवाएं |
  • शयन कक्ष को गृह के दक्षिणी भाग में निश्चित करें |
  • भोजन करने का स्थान पश्चिम दिशा में होना चाहिए |
  • पूजा गृह ईशान कोण में अधिक शुभ रहता है |
  • शौचालय नै ऋ त्य दिशा में बनवाएं |
  • नैऋत्य एवम पश्चिम दिशा के मध्य अध्ययन कक्ष शुभ रहता है |
  • सीढ़ी उत्तर या पश्चिम में शुभ हैं ,विषम संख्या में हों तथा सदैव दा ऍ ओर मुडती हों |ऊपर पूर्व या दक्षिण की ओरखुलती हों
  • गृह के प्रथम खंड में सूर्य किरण तथा वायु का आना बहुत शुभ होता है |
मुख्य द्वार
  • १५हाथ ऊँचा ,८ हाथ चौडा उत्तम एवम १३ हाथ ऊँचा ७ हाथ चौडा मध्यम कहा गया है |
  • मुख्य द्वार के सामने कोई वृक्ष ,स्तंभ ,मन्दिर ,दिवार का कोना ,पानी का नल ,नाली ,दूसरे घर का द्वार तथा कीच हो तो वेध करता है |
  • गृह की ऊंचाई से दुगनी दूरी पर वेध हो या गृह राजमार्ग पर स्थित हो तो वेध नहीं होता |
  • वास्तुराज वल्लभ के अनुसार सिंह -वृश्चिक -मीन राशिः वालों के लिए पूर्व दिशा में ,कर्क -कन्या -मकर राशिःवालों के लिए दक्षिण ,मिथुन -तुला -धनु राशिः वालों के लिए पश्चिम एवम मेष -वृष - कुम्भ राशिः वालों के लिएउत्तर दिशा में मुख्य द्वार बनवाना शुभ होता है |
  • वराह मिहिर के अनुसार जिस दिशा में मुख्य द्वार रखना है भूखंड की उस भुजा के बराबर आठ भाग करें ,पूर्वीदिशा में बांयें से तीसरा व चौथा भाग ,दक्षिण दिशा में केवल चौथा भाग ,पश्चिमी दिशा व उत्तरी दिशा में तीसराचौथा -पांचवां भाग मुख्य द्वार के निर्माण के लिए शुभ होता है |
- अन्य दोष निवारक वास्तु नियम
  • गृह में प्रवेश करते समय गृह का पृष्ठ भाग दिखना शुभ नहीं होता |
  • उत्तर एवम पश्चिम दिशा में रोशनदान शुभ नहीं होते |
  • पंचक नक्षत्रों में घर के लिए लकड़ी मत खरीदें |
  • घर के सभी द्वार एक सूत्र में होने चाहियें ,ऊपर की मंजिल के द्वारों किउंचाई नीचे के द्वारों से द्वादशांश छोटी होनी चाहिये | गृह के द्वार अपने आप ही खुलते या बंद होते हो तो अशुभ है । गृह क द्वार प्रमाण से अधिक लम्बे हो तोरोग कारक तथा छोटे हो तो धन नाशक होते है । गृह द्वार पर मधु का छत्ता लगे या चौखट, दरवाजा गिर जाये तोगृह पति को कष्ट होता है । घर में चौरस स्तम्भ बनवाना शुभ होता है तथा गोल स्तम्भ बनवाना अशुभ ।
  • गृह वृद्धि चारो दिशाओ में समान होनी चाहिये । केवल पूर्वी दिशा में वृद्धि करने पर मित्र से वैर ,उत्तर में चिंता , पश्चिम में धन नाश तथा दक्षिण में क्षत्रु भय होता है ।
  • द्वार उपर के भाग मई आगे घुका हो तो संतान नाशक होता है ।
  • घर मई कपोत , गिद्ध , वानर , काक तथा भयानक चित्र शुभ नही होते ।
  • घर के उद्यान में अशोक, निम्बू ,अनार ,चम्पक , अंगूर , पाटल , नारियल ,केतकी ,शमी आदि वृक्षो का लगाना शुभहै।
  • घर के उद्यान में हल्दी , केला , नीम , बेहडा ,अरंड तथा सभी कांटे दार एवं दूध वाले वृक्ष लगाने का निषेध है ।
  • मुख्य द्वार पर स्वास्तिक , गणेश , कलश, नारियल ,शंख ,कमल आदि मंगलकारी चिह्नों को अंकित करने से गृह के दोषों का निवारण होता है ।
  • नवीन गृह में प्रवेश से पूर्व वास्तु पूजा तथा श्री रामचरितमानस का पाठ करने से समस्त वास्तुजनित दोष दूर हो जाते है ।